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एक ही प्रोडक्ट की किंमत में इतना अलग अलग फ़र्क़ क्यों होता है?


बाज़ार में कई बार एक ही कंपनी के एक ही मॉडल में अलग अलग दुकान मे अलग अलग किंमत देखी जाती है। हर प्रोडक्ट के साथ ऐसा होता है, और सिलाई मशीनें भी इसका अपवाद नहीं है। इस ट्रेंड के पीछे कई सारे कारण हो सकते है।


१) दुकानदार कई तरह के होते है, जैसे फुटकर दुकानदार, डीलर, विक्रेता, सहविक्रेता, डिस्ट्रीब्यूटर या सीधा मैन्यूफैक्चरर। सभी की लागत में अंतर होता है, जिसकी वजह से उनकी परचेस कॉस्टिंग उनकी सेल प्राईज पर असर डालती है।


२) स्वभावत: हर विक्रेता के प्राफिट मार्जिन में भी अंतर होता है। कुछ डीलर ५% से भी कम मार्जिन में माल बेचते है, जबकि कुछ डीलर २५% से भी ज़्यादा प्रॉफिट मार्जिन रखकर काम करते है।


३) प्रोडक्ट की संख्या के आधार पर भी विक्री मूल्य तय होते है। कुछ दुकानदार महीने की १० से भी कम सिलाई मशीन बेचेंगे, तो कुछ २०० से भी ज़्यादा। स्वाभाविक रूप से रेटों में अंतर होगा ही। क्योंकि जितना अंतर सेल में होता है, उतना ख़र्चों में नहीं होता। सारा तेल उपलब्ध तिलो में से ही निकलेगा।


४) बाज़ार, गॉव, शहर या क्षेत्र की डिमांड या चलन के हिसाब से भी रेट तय होते है। कुछ क्षेत्र स्वाभाविक रूप से उपजाऊ या ज़्यादा खुशहाल होते है, जिसकी वजह से प्रतियोगिता या कांपीटीशन कम होता है।


५) कई डीलर प्रोडक्ट की वारंटी के नियम और शर्तों के साथ काफ़ी लचीले होते है। अमूमन सिलाई मशीनों का ग्राहक वही से मशीन लेनाज़्यादा पसंद करता है, जहॉ पर ऑफ्टर सेल सर्विस सिस्टम ज़्यादा मज़बूत हो। और सिलाई मशीनों में ये सर्विस वारंटी कम से कम १वर्ष से ५ वर्ष तक होती है, जो कंपनी की जगह पर स्वयं बेचने वाले डीलर को मेंटेन करनी पड़ती है। ये वारंटी कई डीलर अपने हिसाब से कम ज़्यादा देते है। प्रोडक्ट पर मिलने वाली सर्विस की वारंटी पर भी मशीन की किंमत तय होती है।


इन दिनों भारत की ९५ प्रतिशत कंपनी डीलर द्वारा वारंटी प्रदान करती है, मगर आज भी कुछ ५ प्रतिशत कंपनी प्रोडक्ट पर वारंटी की जगह ग्यारंटी देती है, जिसमें किसी प्रोडक्ट में कोई तकनीकी ख़ामी या मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट आने पर मशीन ही बदल कर दे दी जाती है। एैसी कंपनियों के प्रोडक्ट कुछ महँगे अवश्य होते है, मगर क्वालिटी, परफ़ॉर्मेंस, सर्विस और टिकाऊपन में ज़बरदस्त होते है।


६) सिलाई मशीन पर इन दिनों जीएसटी की जो दर है, वह १२ और १८ प्रतिशत है। सिलाई मशीन व्यवसाय एक असंगठित क्षेत्र या अनआर्गनाईझ्ड सेक्टर है, जहॉ पर ४० प्रतिशत व्यवसाय बड़ी या संगठित कंपनियों द्वारा होता है, जबकि ६० प्रतिशत व्यवसाय असंगठित छोटी छोटी कंपनियों या असेम्बलींग करने वाले लघु उद्योग या मिस्त्रियो के ज़रिए किया जाता है। इसलिये यहॉ पर इसी अनुपात में टैक्स रजिस्ट्रेशन वाले डीलर्स है। काफ़ी सारा व्यवसाय टैक्स के दायरे से बाहर होता है, जिसकी वजह से १२ से १८ प्रतिशत टैक्स की बचत कर के कुछ छोटी कंपनियाँ या डीलर्स अपने अनब्रांडेड प्रोडक्ट को ज़्यादा मुनाफ़ा लेकर भी बाज़ार मूल्य से सस्ते बेच डालते है।


७) प्रोडक्ट दिखता एक जैसा है, मगर फ़र्क़ ज़मीन आसमान का होता है। और विशेष रूप से सिलाई मशीन बेचते समय यही सबसे बड़ा कारक होता है, जो मशीन के रेटों पर सबसे ज़्यादा या सबसे बड़ा फ़र्क़ डालता है। क्योंकि पहले बताये गये सभी ६ कारणों से सिलाई मशीन की किंमत में अधिकतम ५% रेट उपर नीचे होंगे, मगर इस एक अकेले कारण से सिलाई मशीन के मुल्य ३० से ४० प्रतिशत भी उपर या नीचे जा सकते है। इस बात को समझने के लिये थोड़ा विस्तार में जाना होगा।


दूसरे सभी कंज़्यूमर प्रोडक्ट की तुलना में सिलाई मशीन का स्ट्रक्चर थोड़ा अलग होता है।


सिलाई मशीन मुख्यतः चार चीज़ों से मिलकर बनती है, जिसमें पहली होती है सिलाई मशीन का हेड या टॉप या इंजन, जो इसका मुख्य भाग होता है। किसी कंपनी की तयार मशीन के हेड में फेरबदल की बहुत ज़्यादा संभावना नहीं होती है, मगर फिर भी कई विक्रेता मशीन के शटल, निडल प्लेट, फ़ीड रॉब या हुकसट में बदलाव कर के किंमत में ३००₹ से ५००₹ का अंतर पैदा कर सकते है। लेकिन असली फ़र्क़ अगली कुछ सहायक असेसरीज में पैदा होता है।


सिलाई मशीनो में हेड के बाद में दूसरा होता है सिलाई मशीन का पायदान या स्टैंड जो पैर से चलने वाली मशीनों के लिये ज़रूरी होता है।


ये पायदान प्योर पिग आयरन की कास्टिंग से भी तयार होते है, और रिमोल्डेड स्क्रैप से भी। स्क्रैप का स्टैंड काफ़ी सस्ता मगर घटिया दर्जे का होता है, जो चलने में काफ़ी वाईब्रेशन और आवाज़ तो करता ही है और पैर से चलाने में काफ़ी जड़ और कम RPM पर चलता है। ज़्यादा दबाव डालने पर इसके टूटने की संभावना भी बनी रहती है। दूसरी ओर ब्रांडेड पिग आयरन से बना ओरीजनल स्टैंड न सिर्फ़ फिटींग और फ़िनिशिंग में परफ़ेक्ट और साउंडलैस होता है, बल्कि चलने में एकदम स्मूथ और ज़्यादा RPM वाला होता है। इसके अलावा हाल के कुछ वर्षों में एक नई तरह का पूरा स्टील या पाईप मैटेरियल में बनाया जाने वाला स्टैंड भी प्रचलन में है, जिसका वजन आम स्टैंड से लगभग आधा होता है, मगर स्टील से बना होने की वजह से ये अनब्रेकेबल होता है। इस स्टैंड ने वर्तमान में तेज़ी से बाज़ार में अपनी जगह बनाई है। इस तरह के स्टैंड तयार करने वाली भारत में २-३ बड़ी कंपनी ही है, जिनकी क्वालिटी और परफेक्शन बेजोड़ है। मगर बाज़ार में आजकल इसकी नक़ल में सिर्फ ७-८ किलो वजन के घटिया स्टैंड बहुत ज़्यादा बनने लगे है, जो बेहद घटिया दर्जे के होते है। क्योंकि इन्हें बनाना एकदम आसान है, और कम लागत में कोई भी कहीं भी इस तरह का स्टैंड छोटी सी जगह में फैब्रीकेट कर सकता है, इसलिये बाज़ार में काफ़ी मात्रा में हल्की मशीनें इन्हीं पायदान के साथ बिक जाती है।