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सिलाई मशीनें कल और आज

रोटी और मकान के साथ साथ कपड़ा मनुष्य की तीन सबसे प्रमुख आवश्यकताओं में से एक है।

शरीर को ढकने के साथ साथ बाहरी वातावरण से सुरक्षा प्रदान करने के लिये कपड़े का उपयोग मानव सभ्यता के विकास के साथ ही प्रारंभ हो गया था।


प्रारंभ में कई वर्षों तक मनुष्य कपड़े का प्रयोग बिना सिये हुये रूप में ही केवल शरीर को छिपाने के लिये एक आवरण के रूप में करता रहा। बाद में सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्य ने कपड़े को पहले सुई और बाद में सिलाई मशीन द्वारा सी कर पहनना प्रारंभ किया।


इंसान की जरूरतें बढ़ती गईं। इसके साथ सुंदर और सुडौल दिखने की चाह भी बढ़ती गई। सुंदर दिखने के लिए सुंदर आकर्षक पहनावे पर ध्यान दिया जाने लगा। इस तरह सिलाई मशीनों पर नए-नए काम करने की खोज होती रही। नए-नए डिजाइन बनने लगे। अब सिलाई मशीनें वह तमाम काम कर सकती हैं जो हम सोच भी नहीं सकते थे। सिलाई मशीनें हाथ, पैर या मोटर से चलती हैं।


सिलाई मशीन एक ऐसा यांत्रिक उपकरण है जो किसी वस्त्र या अन्य चीज को परस्पर एक धागे या तार से सिलने के काम आती है।इनका आविष्कार प्रथम औद्योगिक क्रांति के समय में हुआ था। सिलाई मशीनों से पहनने के सुंदर कपड़े छोटे-बड़े बैग, चादरें, पतली या मोटी रजाइयां सिली जाती हैं। सुंदर से सुंदर कढ़ाई की जाती है और इसी तरह बहुत कुछ किया जा सकता है।

दो हजार से अधिक प्रकार की मशीनें भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए प्रयुक्त होती हैं जैसे कपड़ा, चमड़ा, इत्यादि सीने की। अब तो बटन टाँकने, काज बनाने, कसीदा का सब प्रकार की मशीनें अलग-अलग बनने लगी हैं। अब मशीन बिजली द्वारा भी चलाई जाती है।


सिलाई मशीन सिलाई की प्रथम मशीन ए. वाईसेन्थाल ने 1755 ई. में बनाई थी। इसकी सूई के मध्य में एक छेद था तथा दोनों सिरे नुकीले थे। 1790 ई. में थामस सेंट ने दूसरी मशीन का आविष्कार किया। इसमें मोची के सूए की भाँति एक सुआ कपड़े में छेद करता, धागा भरी चरखी धागे को छेद के ऊपर ले आती और एक काँटेदार सूई इस धागे का फंदा बना नीचे ले जाती जो नीचे एक हुक में फँस जाता था। कपड़ा आगे सरकता और इसी भाँति का दूसरा फँदा नीचे जाकर पहले में फँस जाता है। हुक पहिले फंदे को छोड़ दूसरे फंदेको पकड़ लेता है। इस प्रकार चेन की तरह सिलाई नीचे होती जाती है। यदि सेंट को उस नोक में छेद का विचार आ जाता तो कदाचित्‌ उसी समय आधुनिक मशीन का आविष्कार हो गया होता।

सिलाई मशीन का वास्तविक आविष्कार एक निर्धन दर्जी सेंट एंटनी निवासी बार्थलेमी थिमानियर ने किया जिसका पेटेंट सन्‌ 1830 ई. में फ़्रांस में हुआ। पहले यह मशीन लकडी से बनाई गई। कुछ दिन पश्चात्‌ ही कुछ लोगों ने इस संस्थान को तोड़-फोड़ डाला जहाँ यह मशीन बनती थी और आविष्कारक कठिनाई से जान बचा सका। सन्‌ 1845 ई. में उसने उससे बढ़िया मशीन का दूसरा पेटेंट करा लियाऔर सन्‌ 1848 में इंग्लैंड और अमेरिका से भी पेटेंट ले लिया। अब मशीन लोहे की हो चुकी थी।


वस्तुत: छेदवाली नोक, दुहरा धागा और दुहरी बखिया का विचार प्रथम बार 1832-34 ई. में एक अमरीकी बाल्टर हंट (Walter Hunt) को आया था। उसने एक घूमने वाले हैंडिल के साथ एक गोल, छेदीली नोक की सूई लगाई थी जो कपड़े में छेद कर नीचे जाती और उसफंदे में से एक छोटी-सी धागा भरी खर्ची निकल जाती, वह फंदा नीचे फँस जाता और सूई ऊपर आ जाती। इस प्रकार दुहरे धागे की दुहरी बखिया का आविष्कार हुआ। जब हट को अपनी सफलता में पूरा विश्वास हो गया तो 1853 ई. में पेटेंट के लिए उन्होंने आवेदन पत्र दिया परंतु उनको पेटेंट न मिल सका क्योंकि यह छेदीली नोक वाला पेटेंट इंग्लैंड में 'न्यूटन ऐंड आर्कीबाल्ड' सन्‌ 1841 में दस्ताने सीने के लिए पहले ही करा लिया था। उसी समय ऐलायस होव ने भी सन्‌ 1846 तक अपनी मशीन बनाकर पेटेंट करा लिया। उसकी मशीन में 12 वर्ष पहले आविष्कृत हंट की दोनों बातें, छेदीली नोक तथा दुहरा धागा, वर्तमान थीं। कुछ समय पश्चात्‌ विलियम थॉमस ने 250 पाउंड में उससे पेटेंट खरीद उसे अपने यहाँ नियुक्त कर लिया, पर वह अपने कार्य में सर्वथा असफल रहा और अत्यंत निर्धन अवस्था में अमरीका लौट आया। इधर अमरीका में सिलाई मशीन बहुत प्रचलित हो गई थी और इज़ाक मेरिट सिंगर ने सन्‌ 1851 ई. में होवे की मशीन कापेटेंट करा लिया था।


सन्‌ 1849 ई. में एलान वी. विल्सन ने स्वतंत्र रूप से दूसरा आविष्कार किया। उसने एक घूमने वाले एवं तथा घूमने वाली बाबिन काआविष्कार किया जो ह्वीलर और विलसन मशीन का मुख्य आधार है। सन्‌ 1850 ई. में विल्सन उससे पेटेंट कराया। इसमें कपड़ा सरकाने वाला चार गति का यंत्र, तो प्रत्येक सीवन के बाद कपड़ा सरका देता था, मुख्य था। उसी समय ग्रोवर ने दुहरे श्रृंखला सीवन (Chain strip) की मशीन आविष्कार किया जो 'ग्रोवर ऐंड बेकर' मशीन का मुख्य सिद्धांत है। 1856 ई. में एक किसान गिब्स ने श्रृंखला सीवन कीमशीन बनाई जिसका बाद में विलकाक्स ने सुधार किया और जो 'गिल्ड विलकाक्स' के नाम से प्रख्यात हुई। अब तो इसका बहुत कुछ सुधार हो चुका है।


जूकी, ब्रदर, पफ, सिंगर, कनसाई, जैक आज सिलाई मशीनों का निर्माण करने वाली विश्व की कुछ सबसे बड़ी निर्माता कंपनी है, जो पूरे विश्व में घरेलू और इंडस्ट्रियल सिलाई मशीनों का निर्यात करती है।


भारत में भी उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक मशीन आ गई थी। इसमें दो मुख्य थीं, अमरीका की सिंगर तथा इंग्लैंड की 'पफ'। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी मशीनें बनने लगीं जिनमें उषा प्रमुख है। सिंगर के आधार पर मेरिट भी भारत में ही बनती है।


भारत में 1935 में कोलकाता (कलकत्ता) के एक कारखाने में उषा नाम की पहली सिलाई मशीन बनी। मशीन के सारे पुर्जें भारत में हीबनाए गए थे। बाद में दुर्भाग्यवश उषा कंपनी का प्रोडक्शन यूनिट किसी कारणवश कलकत्ता में पूरी तरह बंद हो गया, और इसके बाद से उषा कंपनी ने अपने ब्रांड को जेमिनी और लक्ष्मी जैसी भारत की बड़ी निर्माता कंपनियों से आउटसोर्सिंग करना प्रारंभ किया, जो वर्तमान में भी आज तक जारी है।


अब तो भारत में तरह-तरह की सिलाई मशीनें बनती हैं। उन्हें विदेशों में भी बेचा जाता है। जेमिनी इन दिनों घरेलू सिलाई मशीनें बनाने वाली भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की सबसे बड़ी निर्माता कंपनी है। पंजाब के लुधियाना शहर में स्थित इस कंपनी द्वारा विश्व के कई देशों में सिलाई मशीनों का निर्यात किया जाता है। लक्ष्मी भी जेमिनी के बाद भारत की सबसे बड़ी कंपनी है। उषा के अलावा, सिंगर, मेरिट जैसे कई देशी और विदेशी ब्रांड अपनी सिलाई मशीनें इन्हीं दो प्रमुख कंपनियों से तयार करवाते है।


लुधियाना के अलावा जलंधर, दिल्ली, हापुड़ और फ़रीदाबाद सिलाई मशीनों के निर्माण करने वाले प्रमुख शहर है, जो तरह तरह की क्वालिटी में कई प्रकार की सिलाई मशीनें बनाते है। पिछले कुछ वर्षों से महाराष्ट्र के अहमदनगर में भी सिलाई मशीनों का बड़े पैमाने पर निर्माण होने लगा है, मगर यहॉ बनने वाली अधिकतर मशीनें बेहद सस्ती और निम्न गुणवत्ता की होती है, जो अधिकांशतः छोटे व्यापारी या दुकानदार अपने नाम से तयार करवाते है।


भारतीय सिलाई मशीनों में वैसे तो अधिकांशतः किसी नई तकनीक को बहुत जल्दी ग्रहण नहीं किया जाता रहा है। इस संबंध में भारतीय सिलाई मशीनों का रिसर्च एंड डेवलपमेंट विभाग बहुत ज़्यादा प्रभावशाली नहीं है, मगर फिर भी हाल के ही कुछ वर्षों में क्यूमैक, ऑन्सर, वेलटैक्स, फ्रेंड, लिंबड, सोनेक्स, जीटी और रॉलसन जैसे कई ब्रांड नई नई प्रभावशाली तकनीक लेकर बाज़ार में उतरते रहते है, जिसके कारण आजकल भारतीय सिलाई मशीनों के इस क्षेत्र में भी क्वालिटी और तकनीक का प्रभाव देखा जाने लगा है। इस प्रकार आज भारत की कुछ मशीनें विश्व के प्रमुख ब्रांड को टक्कर दे रहे है।

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